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“Current West Asian Cold War and its impacts on India”

सुनो…. अच्छा ही तो है कि तुम स्कूल से सीधे जन्नत चले गए हो शायद स्कूल से बेहतर जगह जन्नत ही हो सकती है… वो आतंकवादी कितने सभ्य थे जिन्होंने तुम्हारे कोमल शरीरों पे कुछ लोहा दागकर तुम्हें जन्नत भेज दिया… अगर तुम यहीँ रहते तो पता है हम तुम्हारे साथ क्या करते???? अरे नहीँ नहीँ… हम तुम्हें मारते नहीँ…. आखिर हम आतंकी थोड़े ही हैं और ना ही हमें जहनुम जाना है…. हम तुम्हें किसी पटाखे की फैक्ट्री में घुसाकर तुमसे दीवाली छीन लेते, तुम्हारी किताबों में ज़हर घोलकर तुमसे पढ़ाई छीन लेते, तुम्हारे हिस्से की सरकारी दवाई किसी प्राइवेट दलाल को बेचकर तुम्हारी सेहत छीन लेते, किसी सड़कछाप ढाबे पर तुम्हें छोटू बनाकर तुम्हारा बचपन लूट लेते, तुम्हारे हाथों पैरों को थोड़ा टेढ़ा मेढ़ा करके किसी सिग्नल पर बिठा के तुम्हारा खेल का मैदान छीन लेते….. फिर भी कुछ बच जाता तो किसी बड़े नाम वाली बदनाम गली में तुम्हे किसी सिरफिरे को बेच देते जो शायद तुम्हें किसी और दरिंदे की सेवा के लिए भेज देता लेकिन तुम तो पहले ही चले गए… नहीँ नहीँ… भेज दिए गए… तुम्हें पता है कल तुम्हारे लिए हमने चौराहे पर मोमबत्तियां जलाई थी, कुछ आंसू और चन्द उदास फेसबुक पोस्टें… बस इतना ही हो पाया हमसे… वो क्या है ना कि हम बड़े व्यस्त हैं… तुम तो ऊपर फ्री हो लेकिन जो तुम्हारे हमउम्र यहां बच गए हैं उन्हेँ ऊपर लिखे कामों में भी तो लगाना है…. क्या पूछ रहे हो- क्यों???? अरे तुम नहीँ समझोगे… हम बड़े लोगोँ को बच्चों से सख्त नफरत है… हमेँ बस चुपचाप काम करने वाले रोबोट चाहिए…. चलो अब मैं तुम्हारे साथियों का बचपन छीनकर उन्हेँ काम पर लगाने का इंतज़ाम करता हूँ…… अब तक तुम्हें सब कुछ समझ आ ही गया होगा और नहीँ आया फिर भी कोई बात नहीँ, बच्चों को सब कुछ समझना ज़रूरी नहीँ होता……..

 

आग??????? कौनसी आग???? कौनसी आग की बात कर रहे हो तुम???? अरे पागल हो गए हो क्या???? क्या कहा?? चौराहा??? मोमबत्ती????? अच्छा अच्छा.. अरे टाइमपास और दिखावे के लिए उठा लेते हैं हम वो मोमबत्तियां हर बार, ये दिखाने के लिए, ये बताने के लिए, ये जताने के लिए कि कितने संवेदनशील हैं हम लोग.. इतनी संवेदना है हमारे अंदर कि दूजे देश पाकिस्तान मेँ स्कूली बच्चों के कत्ल का बहुत दुःख है हमें… उनके लिए दिल्ली के इंडिया गेट, PU के Stuce या शहर के किसी व्यस्त चौराहे पर हाथों में मोमबत्तियां और कुछ चिकने क्रन्तिकारी पोस्टर्स लेकर इकट्ठा हो सकते हैं हम लोग, आँखों में आँसू लिए, सच में कितने संवेदनशील हैं ना हम लोग????? अरे रुको तो सही… कुछ और तो सुन लो… फिर किसी सिग्नल पर किसी अपाहिज बच्चे को भीख मांगता देखकर हम अपनी आँखें मोड़कर अपनी संवेदना का गला क्यों घोट देते हैं?? किसी सड़कछाप ढाबे पर किसी छोटू के गालों पर चांटे लगाते या लगते हुए देखकर हमारी आँखों के आंसू क्यों सुख जाते हैं??? किसी मुन्नी या राजू को कंपकंपाती सर्दी में फूटपाथ पर कम्पित देख कर भी हमें अपने हीटर वाले कमरे की रज़ाई में नींद कैसे आ जाती है???? कूड़े के ढेर में रोज़ी तलाशते नन्हे हाथों को देखकर हमारा दिल क्यों नहीँ पसीजता???? चूहों की दवाई खिलाकर गरीब माँओं को मारकर हम उनके अनाथ बच्चों के प्रति क्यों संवेदनहीन हो जाते हैं??? जब हज़ारों गरीब बच्चे दिमागी बुखार या मलेरिये से मर जाते हैं और उनके हिस्से की मुफ़्त दवाई किसी दलाल के गोदाम की शोभा बढाती है तो हमारी क्रन्तिकारी मोमबत्ती की लौ क्यों नहीँ जलती???? जब इन बच्चों को किताबों और स्कूल की जगह मशीनें और फैक्ट्री दिखाई जाती है तब हम उन नामी चौराहों पर क्यों इक्कठा नहीँ होते???? क्या बच्चे सिर्फ आतंकियों की गोलियों से मरते हैं???? जब हम उनका बचपन रौंदते हैं उसको क्या कहते हैं??? क्या हुआ???? सच तो ये है कि हमारी संवेदना हमारे क्रन्तिकारी हथियार मोमबत्ती के मोम की तरह है जो उसी चौराहे पर दम तोड़ कर खामोश हो जाती है या उस समय जागती है जब किसी बड़े न्यूज़ चैनल या अख़बार का कैमरा स्माइल प्लीज बोलता है…. सही भी है… इतनी संवेदना दिखाने पर एक चिकना फोटु तो बनता ही है….

 

सुनो……. तुम से एक बात कहनी है…. यार इस धुंध भरी सर्द सुबह में उठने का बिलकुल मन नहीँ करता…. ये रज़ाई जैसे मेरे ठंडे शरीर का एक ज़रूरी गरम हिस्सा बन जाती है, बाहर की सर्दी जैसे मुझे इस रज़ाइनुमा किले से बाहर ना आने की चेतावनी देती है…. सुबह का अलार्म….. एग्जाम की टेंशन….. रूममेट की आवाज़ें जैसे सबकुछ मेरे इस रज़ाइनुमा किले को भेदकर मुझे उठाने में असमर्थ हो जाते हैं….. लेकिन फिर मुझे तुम्हारी याद आती है, मेरी बन्द आँखों के सामने तुम्हारा गोल सा चेहरा एकदम से प्रकट हो जाता है… तुम्हारी भीनी भीनी खुशबू मेरे नाक को सुगन्धित करते हुए जैसे दिल में प्रवेश कर जाती है…. ऐसा लगता है कि मानो तुम मेरा इंतज़ार कर रहे हो कि मैं कब आऊँ और तुम्हारे बदन पर हाथ फेरूँ….. थोड़ी हाथों की कसरत करके तुम्हें धीरे से अपने होंठो के पास ले जाऊँ….. जानते हो सबसे ज़्यादा मज़ा मुझे कब आता है???? जब मैं तुम्हारे रूखे बदन पर उस छोटे से टुकड़े से मालिश करके उसे चिकना कर देता हूँ…. फिर जब मैं तुम्हारे चमकते बदन को निहारता हूँ तो मानो जैसे दो पल के लिए हम दोनों एक अपनी ही दुनिया में चले जाते हैं…… तुम कितने अच्छे हो यार!!! जब मेरे हाथ तुम्हारे तैलीय बदन पर होते हैं और तुम्हारा एक हिस्सा मेरे मुँह में घुल जाता है तो जैसे हम दोनों मिलकर इस सर्द सुबह को धोबिपछाड़ पटखनी दे देते हैं…. इस सर्दी में सच में तुम्ही मेरे सच्चे यार हो, जानता हूँ कि यारों को शुक्रिया नहीँ कहा जाता फिर भी इस सर्दी भरी सुबह में ठण्ड को पछाड़ने और मुझे उठाने के लिए शुक्रिया…… हे मेरे प्यारे आलू के परांठे, मैं तेरा ये अहसान कभी नहीँ भूलूंगा……

 

सुनो……. तुम से एक बात कहनी है…. यार इस धुंध भरी सर्द सुबह में उठने का बिलकुल मन नहीँ करता…. ये रज़ाई जैसे मेरे ठंडे शरीर का एक ज़रूरी गरम हिस्सा बन जाती है, बाहर की सर्दी जैसे मुझे इस रज़ाइनुमा किले से बाहर ना आने की चेतावनी देती है…. सुबह का अलार्म….. एग्जाम की टेंशन….. रूममेट की आवाज़ें जैसे सबकुछ मेरे इस रज़ाइनुमा किले को भेदकर मुझे उठाने में असमर्थ हो जाते हैं….. लेकिन फिर मुझे तुम्हारी याद आती है, मेरी बन्द आँखों के सामने तुम्हारा गोल सा चेहरा एकदम से प्रकट हो जाता है… तुम्हारी भीनी भीनी खुशबू मेरे नाक को सुगन्धित करते हुए जैसे दिल में प्रवेश कर जाती है…. ऐसा लगता है कि मानो तुम मेरा इंतज़ार कर रहे हो कि मैं कब आऊँ और तुम्हारे बदन पर हाथ फेरूँ….. थोड़ी हाथों की कसरत करके तुम्हें धीरे से अपने होंठो के पास ले जाऊँ….. जानते हो सबसे ज़्यादा मज़ा मुझे कब आता है???? जब मैं तुम्हारे रूखे बदन पर उस छोटे से टुकड़े से मालिश करके उसे चिकना कर देता हूँ…. फिर जब मैं तुम्हारे चमकते बदन को निहारता हूँ तो मानो जैसे दो पल के लिए हम दोनों एक अपनी ही दुनिया में चले जाते हैं…… तुम कितने अच्छे हो यार!!! जब मेरे हाथ तुम्हारे तैलीय बदन पर होते हैं और तुम्हारा एक हिस्सा मेरे मुँह में घुल जाता है तो जैसे हम दोनों मिलकर इस सर्द सुबह को धोबिपछाड़ पटखनी दे देते हैं…. इस सर्दी में सच में तुम्ही मेरे सच्चे यार हो, जानता हूँ कि यारों को शुक्रिया नहीँ कहा जाता फिर भी इस सर्दी भरी सुबह में ठण्ड को पछाड़ने और मुझे उठाने के लिए शुक्रिया…… हे मेरे प्यारे आलू के परांठे, मैं तेरा ये अहसान कभी नहीँ भूलूंगा……

 

 

BY : Rajneesh Sharma

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