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जाट आरक्षण का राजनीति-अर्थशास्त्र

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(This article was written in 2012)
आरक्षण पर राजनीति का बाजार एक बार फिर गर्म है। हरियाणा के हिसार जिले में जाट समुदाय आरक्षण की मांग करते हुए सड़कों पर उतर आया है। आरक्षण की मांग पर अब तक दो नवयुवक अपनी जान भी गवां चुके हैं। जिसके विरोध में हुए हिंसक प्रदर्शनों में काफी सार्वजनिक और निजि सम्पत्ति सवाह हो गई। बीस वर्ष पहले अन्य पिछड़े वर्ग को मिले आरक्षण का विरोध करने वाले जाट समुदाय के लोग खुद आरक्षित श्रेणी में आने के लिए आने के लिए बेताब हो रहे हैं। आरक्षण की इस मांग में राजनीतिक रोटियां भी सेकी जा रही है। इंडियन नैशनल लोकदल के सुप्रीमों व पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला ने गोली लाठी के दम पर इस संघर्ष को दबाने का विरोध किया है तथा मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग की है, वहीं कांग्रेस के मंत्री ओम प्रकाश चौटाला पर इल्जाम लगा रहे हैं कि उनकी पार्टी जाट समुदाय की भीड़ को हिंसक बना रही है। जाट वोट की लालसा में लगभग सभी पार्टियां जाट वोट पाने के लिए हत्याकांड का विरोध कर रही हैं और एक स्वर में जाट आरक्षण की वकालत कर रही हैं। जबकि गैर-जाट की राजनीति करने वाले जनहित कांग्रेस के अध्यक्ष कुलदीप बिश्नोई भी चुनावी समीकरण के मद्देनजर बयानबाजी कर रहे हैं।
लगभग सभी चुनावबाज पार्टियों के नेता जाट आरक्षण का समर्थन करने के हुंकारे भर रही हैं।  राजनेता आरक्षण की नीति की अर्न्तवस्तु समझे बिना और उसके लक्ष्यों को जाने बगैर एक स्वर में जाट आरक्षण के समर्थन में बड़े-बड़े वक्तव्य जारी करने लगे। क्या आरक्षण जाटों की समस्याओं को हल करने का रामबाण है जिससे उसकी हर तकलीफ दूर हो जाएगी। क्या पूर्व में आरक्षित जातियों की सभी समस्याओं का समाधान हो पाया है। हमें आम जनता की खासतौर पर जाट समुदाय के किसानों की समस्याओं के सही कारणों को समझना जरूरी है ताकि उनका उचित निदान निकाला जा सकें। साथ ही अपने दोस्तों और दूश्मनों की सही पहचान की जा सकें।
पृष्ठभूमि
भारत में आरक्षण का प्रावधान संविधान में किया गया था। प्रत्येक  प्रान्त में छुआछात के कारण उत्पीड़न का शिकार होने वाली जातियों को राज्यों की अनुसूचित सूची में शामिल किया जाता था। सन् 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने मण्डल कमीशन की सिफारिशों के तहत पिछड़ी जातियों-बैकवर्ड कास्ट को भी आरक्षण का अधिकार दिया। इन जातियों को आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति के अनुसार दिया गया।
हरियाणा में भी पिछडी जातियों की पहचान करने के लिए जस्टिस गुरनाम सिंह आयोग बनाया गया। इस आयोग ने मुख्यतः पिछडी जाति की पहचान के लिए तीन पैमाने बनाए। उसने सामाजिक और शैक्षणिक के अलावा आर्थिक स्थिति को भी पिछड़ेपन की पहचान के लिए आधार बनाया। हालांकि यह आयोग अपने मापदण्ड निर्धारित करने और उसमें व्यापक फेरबदल किए जाने के कारण विवादास्पद रहा है। आयोग ने अहीर, बिश्नोई, गुज्जर, जट्सिक्ख, मेव, रोड, सैनी और त्यागी आदि जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने का अनुमोदन किया। हरियाणा विधान सभा ने जस्टिस गुरनाम सिंह आयोग की रिपार्ट को सर्वसम्मति से पारित कर अन्तिम अनुमति के लिए केन्द्र सरकार के पास भेज दिया। 1996 में केन्द्र सरकार ने हरियाणा में गुज्जर, सैनी, मेव और यादव जातियों को ही पिछड़ी जातियों की अनुसूची में शामिल करने की अनुमति दी। जाट समुदाय के कुछ नेताओं ने जाटों को हरियाणा की अन्य पिछड़ी जातियों की श्रेणी में शामिल करने की मांग की थी। आयोग ने हरियाणा के जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में रखे जाने के योग्य नहीं माना क्योंकि हरियाणा में वे सामाजिक सोपान में उच्च स्थान पर हैं। तभी से हरियाणा की राजनीति में जाटों को आरक्षण देने पर चर्चा होती रही है। परन्तु इस मुद्दे पर कोई व्यापक गोलबन्दी नहीं हो पाई थी।
परन्तु 10 साल बीतने के बाद जाट समुदाय आरक्षण की मांग पर हिंसक संघर्ष करने लगा। आखिर जाट समुदाय आरक्षण की मांग पर इतना आक्रोशित क्यों हो गया? आरक्षण उन्हें समस्याओं के निदान के रूप में क्यों नजर आने लगा? 1990 में पिछड़े वर्ग को आरक्षण दिए जाने का विरोध करने वाला यह समुदाय की मांगे 180 डिग्री पर क्यों घुम गई? खुद को समाज में अत्यन्त उच्च स्तर पर समझने वाली यह जाति क्यों पिछड़े वर्ग में शामिल होने को तैयार हो गई है? इस बदलाव को 20 सालों के दौरान हुए बदलावों के मद्देनजर समझने की जरूरत है।
नई आर्थिक नीति और किसानों की बदहाली:
1991 में निजिकरण, उदारीकरण और भूमण्डलीकरण के आगमन के साथ भारत की खेती पर संकट के बादल छा गए जिसने किसान समुदाय की हालत पतली कर दी। चुंकि जाट समुदाय की बहुसंख्या कृषक है इसलिए इन नीतियों का असर इस समुदाय पर बहुत पड़ा। खेती में दी जा रही सब्सिड़ी में कटौती ने खाद की दरों में बढ़ोतरी कर दी, टयूबवैल लगवाने, ट्रैक्टर खरीदनें और कृषि यन्त्र महंगें हो गए। बिजली के निजिकरण और पैट्रोलियम पदार्थो खासतौर पर डीजल के रेट में बढ़ोतरी से खेती महंगी होती गई। इन नीतियों ने किसानों की कमर तोड़ डाली। किसान कर्ज की दलदल में फंस गया। ज्यादातर छोटे और मध्यम किसानों पर आढ़तियों का कर्ज है। आढ़तिये किसानों से 3 से 5 प्रतिशत की दर से ब्याज वसूल करते हैं। कर्ज की ऐवज में बडे़ जमींदार और आढ़तिए किसानों की जमीन सस्ते दामों में खरीद लेते हैं।
पिछले 15 सालों में भारत में अढाई लाख से ज्यादा किसान कर्ज के कारण आत्महत्या करने पर मजबूर हुए हैं। 2005 तक हरियाणा में भी किसानों की आत्महत्या के 393 मामले सामने आए हैं। जबकि किसान आत्महत्या के अधिकतर केस बदनामी के भय के कारण रिपोर्ट ही नही होते। आत्महत्याओं करने वालों में 63 प्रतिशत जाट समुदाय से हैं। हरियाणा कृषक समाज द्वारा हिसार के नजदीक के उपमंडल नरवाना में किए सर्वे के अनुसार कम से कम 70 किसानों ने आत्महत्या की थी।  गौरतलब है कि हरियाणा का यह क्षेत्र कपास उत्पादक क्षेत्र है और पुरे भारत में सबसे ज्यादा आत्महत्या कपास उत्पादक किसानों ने ही की है।
हरियाणा के किसानों को दिल्ली के नजदीक होने का खामियाजा भी भूगतना पड़ा। दूसरी पीढी के सुधारों के नाम पर लाई गई ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’ की नीति के कारण यहां रियल एस्टेट कारोबार फलने फूलने लगा। दिल्ली के चारों तरफ काफी जमीनें बिकी। कर्ज जाल में फंसे हरियाणा के किसानों ने जमीन बिक्री को कर्ज उतारने के साधन के रूप में अपनाया। किसानों ने अधिकतर धन कर्ज उतारने, शादी विवाह जैसे सामाजिक उत्तरदायित्वों कोे पूरा करने के साथ साथ शानों-शोकत में खर्च कर दी गई। अधिकतर किसानों से उनकी आजीविका का साधन छीन गया। रियल एस्टेट व्यापार और गुडगांवों के आसपास मेें हुआ तथाकथित विकास जमीनों से बेदखल किसानों को आजीविका या नौकरी देने में विफल रहा।
आबादी बढने के कारण जमीनों का बंटवारे, खेती में बचत न होने, बढ़ते उभोक्तावाद, किसानों पर चढ़ते कर्ज, रोजगार के सीमित अवसर आदि कारणों से जाट युवाओं सरकारी नौकरी ही सुरक्षित आय स्त्रोत के रूप में नजर आ रही है। सरकार द्वारा उपेक्षित कृषि क्षेत्र में वे अपना भविष्य सुरक्षित देख पाने में असमर्थ हैं। यहां तक कि सरकारी नौकरी ही जाट समुदाय में शादी होने की गारन्टी करती है। क्योंकि कन्या भ्रुण हत्या के कारण लड़का लडकी के अनुपात में भयंकर घटोतरी हुई है। जिससे गरीब किसानों के लड़कों की शादी होने में दिक्कतें आ रही है।
पिछले 20 सालों में हुए सामाजिक आर्थिक बदलावों के कारण नौकरियों की तरफ जाट समुदाय के युवाओं का रूझान बढ़ा है। सरकारी नौकरी इस सामाजिक-आर्थिक संकट से उभरने के सबसे कारगर हथियार के रूप में नजर आती है। इसी सरकारी नौकरी की आस में आज जाट समुदाय आरक्षण की मांग पर उतर आया है।
आरक्षण: सामाजिक भेदभाव कम करने में सहायक, आर्थिक संकट दूर करने का माध्यम नहीं
जाट समुदाय का युवा वर्ग सरकारी नौकरियों से अपने आर्थिक संकट का हल निकालने का सपना पाल रहा है। परन्तु भारत की 120 करोड़ जनता में मात्र अढ़ाई करोड़ लोग ही सरकारी नौकरीयों में कार्यरत हैं, जिसमें अधिकतर 1990 के दशक से पूर्व नियुक्ति हुए हैं। 1991 के बाद से सरकारी विभागों में ज्यादातर नई भर्तियां ठेकेदारी, पार्ट टाईम, गैस्ट या आउटसोर्सिंग के रूप में ही ही हो रही हैं। पिछले बीस वर्षाें के दौरान सरकारी नौकरियों की कुल संख्या में कमी आई है। सरकारी महकमें नवयुवकों को स्थायी नौकरियां ही नहीं देना चाहते, सभी को सरकारी नौकरियां मिलना तो दूर की कौडी है।
आरक्षण का लाभ पाने वाली जातियों में भी अधिकतर नवयुवक आज भी बेरोजगार ही हैं। सांख्यिकी सारांश, हरियाणा 2007-08 के अनुसार हरियाणा में अनुसुचित जाति के मात्र 46 हजार 151 लोगों को ही स्थायी सरकारी नौकरियां मिली है। जबकि उसमें नौकरियां करने में सक्षम कार्यकर्ताओं की संख्या लगभग दस लाख है। अनुसुचित जाति के 95 प्रतिशत लोग आज भी सरकारी नौकरियां से वंचित हैं। यही हाल पिछड़ा वर्ग का भी है। उसमें भी मात्र 52,311 लोगों को ही सरकारी नौकरियां मिली हैं। पिछड़ा वर्ग का बाकि हिस्सा अभी भी सरकारी नौकरियों की बाट जोह रहा है। दलितों में अधिकतर लोग आज भी खेतीहर मजदूर के रूप में कार्यरत हैं या फिर शहरों में मजदूरी करते हैं। आरक्षण नीति जाति के सभी सदस्यों की आर्थिक उन्नति का हथियार नहीं बन सकता।
सरकारी नौकरियों में भर्ती अत्यन्त कम होने के कारण आरक्षण की नीति कागज का पूर्जा मात्र रह गई है। सांख्यिकी सारांश हरियाणा 2007-2008 के मुताबिक 1995-96 में हरियाणा में सरकारी कर्मचारियों की कुल संख्या 4,25,462 थी। इन सरकारी कर्मचारियों में केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, अर्धसरकारी और स्थानीय निकायों में कार्यरत सभी कर्मचारी शामिल हैं। परन्तु 2007-08 के अनुमानित आंकडों के मुताबिक इन कर्मचारियों की संख्या घटकर मात्र 3,74,576 रह गई है। इस तरह सरकारी नौकरियां एक दिवास्वपन बन गई है। भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजिकरण की नीतियां अपनाने के बाद सरकार ने ढंाचागत समायोजन करते हुए सरकारी कर्मचारियों की संख्या घटाने की नीति अपनाई। आज स्थायी सरकारी नौकरियों में भर्ती ना के बराबर होती है। सरकारी नौकरियां पाना भी ढ़ेडी खीर बन गया है। अगर आरक्षण का प्रावधान कर भी दिया जाए तो सरकारी नौकरियां पाना हंसी मजाक का खेल नहीं होगा। सांख्यिकी सारांश के अनुसार आज 2007 में रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या 9 लाख से उपर है। जबकि आज तक कुल सरकारी नौकरियों में लगे लोगों की संख्या मात्र सांढे तीन लाख। ऐसे में सरकारी नौकरियों से आर्थिक उन्नति का सपना ख्यामख्याली के अलावा कुछ नहीं हो सकता।
दरअसल आरक्षण की नीति की भूमिका सामाजिक तौर पर उत्पीड़ित जातियों की सामाजिक स्थिति ऊपर उठाने में और जातिय भेदभाव को कम करने तक ही सीमिज है। सरकारी नौकरी पाने वाले अनुसुचित जातियों/पिछडा वर्ग के लोग उन सामंती बंधनों में जकड़े खेतिहर सम्बन्धों से मुक्त हो जाते हैं जो जातिय शोषण और उत्पीड़न का स्त्रोत हैं। सरकारी नौकरी सामाजिक तौर पर उत्पीड़ित जातियों के आत्मविश्वास में वृद्धि करती हैं तथा स्वाभिमान से जिन्दगी जीने की ललक भी बढा़ती है। आरक्षण जातिय उत्पीड़िन के खात्मे की सोच विकसित करने का आधार तैयार करता है। परन्तु मात्र आरक्षण के जरिए सामाजिक भेदभाव को पूर्णतया खत्म नहीं किया जा सकता।
जबकि हरियाणा में जाट समुदाय कभी भी जातिय आधार पर उत्पीड़ित नहीं रहा। सल्तनत व मुगल काल में स्थायी कृषक बने जाट जाति के लोगों का एक हिस्सा शासकीय ढ़ांचे का अंग रहा हैं। मुगल काल में जाट समुदाय के लोग अच्छी-खासी संख्या में लगान अधिकारी के रूप में नियुक्त किए गए थे, जिन्हें चौधरी कहा जाता था। आज भी चौधरी शब्द जाटों में प्रभुत्वशाली वर्ग के लिए प्रयोग किया जाता है। हरियाणा में कुछेक गांवों/इलाकों को छोड़कर क्षेत्रिय और ब्राहम्ण जाति कभी प्रभुत्वशाली नहीं रही। यहां ज्यादातर किसान मौरूसी थे। वे राजस्थान की तरह राजपूतों की रैयत नहीं थे। हरियाणा में जाट ही जातिय व्यवस्था मे उच्चतम सोपान पर हैं। अंग्रेजी शासन के दौरान लगान वसूलनें के ढांचे में जैलदार के पदों पर काफी संख्या में जाटों को ही नियुक्त किए गया था। हालांकि अत्याधिक लगान वसूली के कारण गरीब और मध्यम किसान जाट बनिया और जाट जाति के ही सूदखोरों के कर्जदार हो गए थे। जाट किसानों की अधिकतर जमीन सुदखोर बनियों के पास गिरवी पड़ी थी। परन्तु उससे जातिय सोपान में जाटों की स्थिति कमतर नहीं हुई थी। जाटों की बहुसंख्या कभी भी जमीन से वंचित नहीं हुई। वे सामाजिक सोपान में उच्च स्थिति पर ही रहे। इसलिए आरक्षण जाट समुदाय की सामाजिक स्थिति बदलने में कोई भूमिका नहीं निभा सकता। दूसरी ओर, आरक्षण बहुसंख्यक जाट नवयुवकों की आर्थिक स्थिति में भी कोई बड़ा बदलाव नही लाने में सक्षम नहीं होगा। इसलिए संकट का हल जाति आधारित आरक्षण में देखने की बजाए मजदूर किसान के हालात बदलने में है।
वर्ग संघर्ष में ही संकट की कुंजी
आरक्षण को सभी राजनीतिज्ञ एकमात्र मुक्ति मंत्र के रूप में पेश कर रहे हैं मानों वो जनता की बदहाली को छूमंतर करते ही दूर कर देगा। पिछड़े वर्ग से उभरे राजनीतिज्ञ, लालू, मुलायम जैसे , पासवान, मायावती जैसे दलित राजनेता, हरियाणा में जाट आरक्षण का कार्ड खेलने वाले राजनेता शामिल हैं। सभी आरक्षण के कार्ड़ पर वोट की राजनीति करते हैं। ये राजनेता जनता को बदहाल बनाए रखने वाली निजीकरण, उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों को बदलने के लिए और सूदखोरों व बडे जमींदारों की लूट को खत्म करने के लिए कोई कदम उठाने के लिए तैयार नहीं है जोकि जनता की उन्नति और विकास का एकमात्र रास्ता है।
अतः जाट समुदाय के मेहनतकश लोगों को जातिय भावना से उपर उठकर अन्य जातियों के लोगों के साथ वर्ग आधार पर एकता स्थापित करते हुए उन सभी सरकारी नीतियों को चुनौती देनी होगी जो उनकी बर्बादी का कारण बनी हुई है, सूदखोरों और बडे जमींदारों से अपनी जमीन वापिस लेने के लिए उस जनता के साथ एकजूट होना होगा जो जमीन जोतने वाले की के नारे के साथ संघर्ष कर रहे हैं, उन सूदखोरों को नियंत्रित करना होगा जो आम जनता से बेतहाशा ब्याज वसूलते हैं। हरित क्रान्ति, औद्योगिक विकास, रियल एस्टेट के नाम पर बहुराष्ट्रीय कम्पनीयों और उनके सहयोगी औद्योगिक घरानों द्वारा की जा रही लूट के खिलाफ समझौताविहीन संघर्ष करना होगा, ताकि उन्हंे इस देश से बाहर निकाल कर आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की नींव रखी जा सके। केवल इसी रास्ते से हम इस भारी संकट के दौर से निकल सकते हैं।

अजय कुमार, चंडीगढ

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